करंट से नहीं, व्यवस्था की लापरवाही से गई विजय की जान? कलेक्ट्रेट में तड़पता रहा लाइनमैन, मदद को नहीं बढ़ा कोई हाथ
पीलीभीत (जे.आई.न्यूज़/अजय रस्तोगी): यह सिर्फ एक हादसा नहीं, बल्कि कई ऐसे सवाल छोड़ गया है जो व्यवस्था, संवेदनशीलता और सरकारी तंत्र की कार्यशैली पर गंभीर प्रश्नचिह्न खड़े करते हैं। मंगलवार को कलेक्ट्रेट परिसर में करंट की चपेट में आने से 22 वर्षीय संविदा लाइनमैन विजय राठौर की मौत हो गई, लेकिन इस घटना का सबसे दर्दनाक पहलू यह बताया जा रहा है कि घायल होने के बाद भी उसे समय पर अस्पताल नहीं पहुंचाया जा सका।
शहर के मोहल्ला मदीना शाह निवासी विजय राठौर अपने साथी कर्मचारियों रामबाबू और जनार्दन के साथ निर्वाचन कार्यालय के बाहर लगे बिजली के पोल पर पेड़ों की टहनियां हटाने का कार्य कर रहा था। साथी कर्मचारियों का कहना है कि कार्य शुरू करने से पहले बिजली लाइन का शटडाउन लिया गया था, हालांकि इसकी पुष्टि विभागीय जांच के बाद ही हो सकेगी।
सबसे बड़ा सवाल यह है कि यदि कर्मचारी को ऊंचाई पर बिजली लाइन के पास काम करना था तो उसके पास हेलमेट, सेफ्टी बेल्ट, ग्लब्स, हार्नेस और अन्य सुरक्षा उपकरण क्यों नहीं थे? प्रत्यक्षदर्शियों और कर्मचारियों के अनुसार विजय केवल एक सीढ़ी के सहारे पोल पर चढ़ा था।
आरोप है कि लाइन बंद होने के बावजूद किसी जनरेटर से बैक करंट तारों में आ गया और विजय उसकी चपेट में आ गया। करंट लगते ही वह कई फीट ऊंचाई से सीधे पक्की जमीन पर आ गिरा। उसके सिर और शरीर में गंभीर चोटें आईं।
घटना के बाद जो तस्वीर सामने आई, उसने मानवता को भी कटघरे में खड़ा कर दिया। कर्मचारियों के अनुसार विजय जमीन पर पड़ा जिंदगी की जंग लड़ रहा था। उसके साथी कलेक्ट्रेट परिसर में मौजूद अधिकारियों, कर्मचारियों और सुरक्षाकर्मियों से मदद की गुहार लगाते रहे। परिसर में सरकारी और निजी वाहन मौजूद थे, लेकिन आरोप है कि किसी ने घायल युवक को तत्काल अस्पताल पहुंचाने की जिम्मेदारी नहीं ली।
करीब आधे घंटे बाद एंबुलेंस पहुंची और विजय को जिला अस्पताल ले जाया गया, जहां डॉक्टरों ने उसे मृत घोषित कर दिया।
घटना के बाद परिजनों और कर्मचारियों में भारी आक्रोश फैल गया। पोस्टमार्टम हाउस पर हंगामा हुआ और लोगों ने सवाल उठाया कि यदि समय रहते मदद मिल जाती तो क्या विजय की जान बच सकती थी? यह सवाल अब पूरे जिले में चर्चा का विषय बना हुआ है।
मामले की गंभीरता को देखते हुए मुख्य अभियंता ने अधीक्षण अभियंता को जांच रिपोर्ट प्रस्तुत करने के निर्देश दिए हैं। जांच में यह स्पष्ट होना बाकी है कि शटडाउन लिया गया था या नहीं, सुरक्षा उपकरण उपलब्ध कराए गए थे या नहीं, और हादसे के बाद राहत पहुंचाने में देरी के लिए कौन जिम्मेदार है।
विजय राठौर अब इस दुनिया में नहीं है, लेकिन उसकी मौत कई सवाल छोड़ गई है—क्या संविदा कर्मियों की जान इतनी सस्ती है? क्या सुरक्षा नियम केवल कागजों तक सीमित हैं? और सबसे बड़ा सवाल, क्या किसी घायल व्यक्ति को बचाने के लिए मानवता भी अब सरकारी आदेशों की मोहताज हो गई है?