72 शहीदों संग कर्बला में इमाम हुसैन की कुर्बानी, इंसानियत और इंसाफ का अमर पैग़ाम
बदायूं (जे०आई०न्यूज़) कर्बला सिर्फ़ एक तारीखी वाक़िआ नहीं, बल्कि हक़, इंसाफ, सब्र और कुर्बानी का ऐसा बाब है, जिसने पूरी दुनिया को ज़ुल्म के ख़िलाफ़ डटकर खड़े रहने का पैग़ाम दिया। इस्लामी तारीख़ के मुताबिक़ 61 हिजरी (680 ईस्वी) में इराक के कर्बला के मैदान में इमाम हुसैन ने अपने 72 जाँनिसारों के साथ हक़ और इंसाफ की हिफ़ाज़त के लिए अज़ीम कुर्बानी पेश की। उनकी शहादत आज भी इंसाफ और इंसानियत की सबसे बड़ी मिसाल के तौर पर याद की जाती है।
कर्बला के वाक़िआ में इमाम हुसैन, उनके अहल-ए-बैत और रुफ़क़ा को कई दिनों तक पानी से महरूम रखा गया। ख़वातीन और मासूम बच्चों तक को पानी नहीं मिलने दिया गया। प्यास से तड़पते बच्चों की हालत देखकर हज़रत अब्बास दरिया-ए-फ़रात से पानी लाने के लिए रवाना हुए। रिवायतों के मुताबिक़ उन्होंने ख़ुद पानी नहीं पिया और बच्चों के लिए मश्क भरकर लौटते वक़्त बहादुरी से लड़ते हुए शहीद हो गए।
कर्बला के मैदान में कमसिन क़ासिम इब्न हसन, छह माह के अली असगर, जवान अली अकबर और बुज़ुर्ग साथी हबीब इब्न मज़ाहिर समेत एक-एक करके सभी ने अपनी जान फ़िदा कर दी, लेकिन किसी ने भी अपने उसूलों से समझौता नहीं किया।
आख़िर में इमाम हुसैन तन्हा रह गए। सख़्त ज़ख़्मी होने के बावजूद उन्होंने ज़ुल्म के आगे सर नहीं झुकाया। इस्लामी रिवायतों के मुताबिक़ उन्हें शहीद कर दिया गया, लेकिन उनका पैग़ाम आज भी पूरी दुनिया में हक़, इंसाफ, सब्र और इंसानियत की रौशनी बनकर ज़िंदा है।
मुहर्रम के मौक़े पर दुनिया भर में लाखों अफ़राद कर्बला के शुहदा को अकीदत के साथ याद करते हैं। उलमा का कहना है कि कर्बला की शहादत यह तालीम देती है कि ताक़त और हुकूमत से बढ़कर हक़, इंसाफ और आला अख़लाक़ी क़द्रों की हिफ़ाज़त है। यही वजह है कि सदियों बाद भी इमाम हुसैन और उनके जाँनिसारों की कुर्बानी तारीख़-ए-इंसानियत में हमेशा ज़िंदा रहेगी।